भक्ति और प्रार्थना
एक सरल प्रार्थना: सद्बुद्धि और करुणा
दिन के आरंभ या अंत में मन से कहने के लिए मौलिक प्रार्थना।
प्रार्थना
हे ईश्वर, मुझे सत्य को स्वीकार करने का साहस दें। मेरी वाणी में नम्रता, कर्म में ईमानदारी और मन में करुणा बनी रहे। जहाँ मैं सुधार कर सकता हूँ, वहाँ प्रयास करूँ; जहाँ सहायता चाहिए, वहाँ विनम्रता से माँग सकूँ।
अपना संकल्प जोड़ें
आज जिन लोगों से मिलूँ, उन्हें सम्मान से सुन सकूँ। क्रोध में किसी को आहत करने से पहले ठहर सकूँ। अपनी भूल पहचानकर क्षमा माँगने और सुधार करने की शक्ति मिले। जो कुछ सीखूँ, उसका उपयोग दूसरों के हित में भी कर सकूँ।
कैसे पढ़ें
इन पंक्तियों को धीरे पढ़ें या अपनी भाषा में कहें। किसी एक वाक्य पर रुककर सोचें कि वह आज आपके जीवन में किस तरह लागू हो सकता है। प्रार्थना के लिए भाव और सजगता को महत्व दें; इसे जल्दी पूरा करने का काम न बनाएं।
शब्द से व्यवहार तक
यदि आपने नम्र वाणी की प्रार्थना की है तो आज एक कठिन बातचीत में उसका अभ्यास करें। यदि करुणा का संकल्प लिया है तो किसी की परेशानी को तुरंत छोटा बताने के बजाय सुनें। इस तरह प्रार्थना और जीवन के बीच संबंध बनता है।
रचना के बारे में
यह Dharma Daily के लिए तैयार की गई मौलिक प्रार्थना है। इसे वेद, उपनिषद, गीता या किसी संत का उद्धरण नहीं माना जाए। आप अपनी मान्यता और पारिवारिक परंपरा के अनुसार इसके शब्द बदल सकते हैं।